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प्रॉफ़िट-लॉस परसेंट कैसे निकालें और 50% गिरने के बाद कितना चढ़ना पड़ता है

DYORly एडिटोरियल टीमअपडेट: 2026-07-17करीब 7 मिनट
ब्रेकईवन टेबल: 10% से 90% तक के नुकसान पर वापसी के लिए कितनी बढ़त चाहिए

50% गिर गया है, तो 50% चढ़ जाएगा तो बराबर हो जाएगा ना? — यह एक लाइन है जिस पर अनगिनत लोग पहली बार फिसले हैं। सुनने में बिल्कुल सीधी बात लगती है, हिसाब लगाते ही ढह जाती है: 50% गिरने के बाद वापस उसी जगह पहुँचने के लिए 100% चढ़ना पड़ता है, 50% नहीं। यही दोगुने का फ़र्क़ है जो लोगों को ले डूबता है। परसेंट निकालना तो एक फ़ॉर्मूला भर है; तीन मिनट देने लायक असली चीज़ नुकसान और वापसी के बीच का वह बेमेल हिसाब है। यहाँ फ़ॉर्मूला भी है, ब्रेकईवन की पूरी टेबल भी — और आख़िर में वह बात जो भारत में सबसे ज़्यादा छूट जाती है: स्क्रीन पर दिखने वाला मुनाफ़ा जेब तक पहुँचते-पहुँचते छोटा हो जाता है।

परसेंट निकालने का फ़ॉर्मूला

फ़ॉर्मूला सीधा है: परसेंट = (मौजूदा भाव − खरीद भाव) ÷ खरीद भाव × 100। नीचे हमेशा आपका खरीद भाव यानी लागत आएगी — हिसाब यही लग रहा है कि मेरी लागत के मुकाबले भाव कितने प्रतिशत ऊपर-नीचे है।

मार्केट पेज पर जो 24 घंटे का परसेंट दिखता है, गणित उसका भी यही है — बस उसका आधार आपकी लागत नहीं, 24 घंटे पहले का भाव होता है। इसीलिए एक ही एसेट पर आपकी होल्डिंग का नफ़ा-नुकसान और पेज पर दिख रहा 24h परसेंट बिल्कुल अलग हो सकते हैं। वह अपने आधार से गिन रहा है, आप अपने आधार से — दोनों की ज़मीन अलग है।

50% गिरने पर 50% चढ़ना काफ़ी क्यों नहीं

सारा खेल इस बात का है कि चढ़ने और गिरने का आधार एक नहीं होता। ठोस मिसाल लीजिए।

आपके पास ₹10,000 हैं। 50% गिरा — ₹5,000 बचे। अब इन ₹5,000 को वापस ₹10,000 पर पहुँचना है, यानी ₹5,000 और बढ़ने हैं। पर ₹5,000 के आधार पर ₹5,000 की बढ़त का मतलब है 5,000 ÷ 5,000 = 100%, यानी पूरा दोगुना। जिस 50% को आप काफ़ी समझ रहे थे, वह ₹5,000 को सिर्फ़ ₹7,500 तक ले जाता — ₹10,000 अभी भी कोसों दूर।

एक लाइन में याद रखिए: गिरते वक्त आधार बड़ा होता है, चढ़ते वक्त छोटा। रकम घट जाने के बाद आप एक छोटे नंबर से वापस ऊपर चढ़ रहे होते हैं, इसलिए उसी पुरानी जगह तक लौटने के लिए बड़ा परसेंट चाहिए। यह कोई गूढ़ बात नहीं, स्कूल का गणित है — और सबसे ज़्यादा लोग यहीं गलत बैठते हैं।

ब्रेकईवन का बना-बनाया फ़ॉर्मूला भी है: ज़रूरी बढ़त = नुकसान का हिस्सा ÷ (1 − नुकसान का हिस्सा)। 50% नुकसान यानी 0.5 ÷ 0.5 = 100%। हिसाब खुद बोल देता है।

ब्रेकईवन टेबल: कितना गिरा, कितना चढ़ना है

आम नुकसान के आँकड़े फ़ॉर्मूले में डालिए तो यह टेबल निकलती है — और यही टेबल होश ठिकाने ले आती है। ₹10,000 की मिसाल साथ रखिए:

नुकसान₹10,000 में से बचाब्रेकईवन के लिए ज़रूरी बढ़त
10%₹9,000करीब +11%
30%₹7,000करीब +43%
50%₹5,000+100%
70%₹3,000करीब +233%
90%₹1,000+900%

ढलान पर ग़ौर कीजिए। 10% गिरे तो 11% में वापसी — लगभग बराबरी, आसान। पर 50% तक पहुँचते ही ज़रूरत सीधे दोगुनी हो जाती है। और 90% गिरने पर ₹1,000 को वापस ₹10,000 बनाना है, यानी दस गुना (+900%)। नुकसान एक कदम गहरा होता है, वापसी की चढ़ाई एक दर्जा और खड़ी हो जाती है — आख़िर में वह चढ़ाई नहीं, दीवार होती है। अपना असली नुकसान डालकर देखना हो, या उलटा टारगेट भाव निकालना हो, तो प्रॉफ़िट/लॉस · ब्रेकईवन कैलकुलेटर में नंबर डालिए, जवाब सामने आ जाएगा।

नुकसान गहरा हो तो वापसी क्यों नहीं होती

टेबल का दूसरा हिस्सा ही सबसे चुभने वाला है। 90% नुकसान पर 900% चाहिए — सुनने में बस एक बड़ा नंबर है, पर ज़मीन पर इसका मतलब क्या निकलता है? मतलब यह कि गहरे फँसी हुई पोज़िशन का अपने दम पर वापस आना लगभग नामुमकिन है। ख़ासकर वे छोटे सिक्के जिनके पीछे कोई असली काम नहीं, जिन्हें भीड़ के जोश ने ऊपर उठाया और उसी जोश ने पटक दिया — नब्बे फ़ीसदी गिरने के बाद वे वहीं ज़मीन पर पड़े रह जाते हैं। दस गुना तो दूर की बात है।

यहीं दूसरी गलती होती है: जितना नुकसान बढ़ता है, उतना ही मन करता है कि थोड़ा और खरीदकर औसत लागत नीचे कर लें, या लीवरेज लगाकर पलटवार पर दाँव लगा दें। पर अगर दिशा ही गलत थी तो नीचे खरीदना सिर्फ़ डूबते गड्ढे में और पैसा डालना है। और लीवरेज तो आग में घी है — एक झटका आया और पोज़िशन लिक्विडेट, वापसी के लिए मूल रकम तक नहीं बचती।

कागज़ का मुनाफ़ा बनाम जेब का मुनाफ़ा

अब वह हिस्सा जो ऊपर की सारी टेबलों में छूट जाता है, और जो भारत में बैठे आपके लिए सबसे ज़्यादा मायने रखता है। ऐप की स्क्रीन पर जो +20% हरे रंग में चमक रहा है, वह जेब में आने वाला 20% नहीं है। बीच में दो चीज़ें खड़ी हैं।

पहली — 30% टैक्स। भारत में क्रिप्टो एसेट के ट्रांसफ़र से हुए मुनाफ़े पर 30% की दर से टैक्स लगता है, और उस पर लागू सरचार्ज तथा सेस अलग से। इसमें एक कड़ी बात और है: एक सौदे का नुकसान दूसरे सौदे के मुनाफ़े के सामने घटाकर टैक्स कम कराने की छूट नहीं मिलती। यानी साल भर में आपने एक जगह कमाया और दूसरी जगह गँवाया, तो टैक्स सिर्फ़ कमाई वाले हिस्से पर बैठेगा — गँवाया हुआ हिस्सा उसमें से घटेगा नहीं। शेयरों वाला जो हिसाब आपके दिमाग़ में बैठा है, वह यहाँ नहीं चलता।

दूसरी — 1% TDS। Section 393(1) (पहले 194S) के तहत क्रिप्टो एसेट के ट्रांसफ़र पर 1% TDS कटता है; आयकर विभाग के TDS compliance पेज पर VDA समेत हर कैटेगरी की मौजूदा शर्तें और फ़ॉर्म एक जगह मिल जाते हैं। इसकी सीमा तय मामलों में ₹50,000 सालाना है और बाकी में ₹10,000। यह मुनाफ़े पर नहीं, सौदे की रकम पर लगता है — इसलिए आप जितनी बार खरीद-बिक्री करेंगे, यह उतनी बार सिर उठाएगा। दिन में दस सौदे करने वाले के लिए यह 1% चुपचाप जुड़ता जाता है, भले उस दिन कुल मिलाकर कमाई हुई ही न हो।

दोनों को जोड़कर देखिए तो बात यह बनती है: कागज़ पर 20% मुनाफ़ा ≠ हाथ में 20% मुनाफ़ा। ऊपर की ब्रेकईवन टेबल भी असल में थोड़ी नरम है — असली ज़िंदगी में फ़ीस, TDS और टैक्स मिलकर वापसी की चौखट को और ऊपर सरका देते हैं। इसीलिए हर छोटी हलचल पर सौदा करने की आदत भारत में दोहरी महँगी पड़ती है: फ़ीस भी, और हर बार का 1% भी।

TDS की सीमाएँ, Form 141 की समय-सीमा, बाइनेंस P2P पर TDS कौन काटता है — यह पूरा हिसाब अलग से लिखा है: भारत में क्रिप्टो पर 1% TDS और 30% टैक्स। अपने सौदे के नंबर डालकर सीधे हिसाब देखना हो तो इंडिया क्रिप्टो टैक्स कैलकुलेटर इस्तेमाल कीजिए। ऊपर लिखी हर बात आयकर नियमों के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार है; यह टैक्स सलाह नहीं है — अपनी स्थिति के लिए CA से पूछें।

इस टेबल का असली संदेश

यह डराने के लिए नहीं है। यह जोखिम की एक सीधी-सादी समझ देने के लिए है: गिरावट को काबू में रखना, बाद में वापसी की उम्मीद पालने से कहीं ज़्यादा व्यावहारिक है।

क्रिप्टो का उतार-चढ़ाव उससे कहीं तेज़ है जिसकी आपको आदत है। यह बेमेल हिसाब दिमाग़ में बैठ गया तो गिरावट के सामने आप ज़्यादा ठंडे रहेंगे, और वह हरकत कम करेंगे जो सबसे भारी पड़ती है — नीचे घबराकर बेच देना और ऊपर जोश में खरीद लेना। भाव, मार्केट कैप, वॉल्यूम जैसी बाकी बुनियादी बातें एक साथ समेटनी हों तो क्रिप्टो मार्केट की बेसिक बातें पढ़ लीजिए। ऊपर सब कुछ जानकारी के लिए है, यह निवेश सलाह नहीं है।

एडिटोरियल टीम की तरफ़ से: टेबल में ब्रेकईवन की बढ़त फ़ॉर्मूले से निकालकर याद रखने लायक अंकों में गोल की गई है। असली सौदों में फ़ीस और भारत में लगने वाले TDS-टैक्स भी जुड़ते हैं, इसलिए ब्रेकईवन की चौखट कुछ और ऊपर ही बैठेगी। यह पेज सिर्फ़ नंबरों का नियम समझाता है, किसी ख़ास एसेट या सौदे की बात नहीं करता। टैक्स से जुड़ी बातें आयकर नियमों के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार हैं; यह टैक्स सलाह नहीं है — अपनी स्थिति के लिए CA से पूछें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रॉफ़िट या लॉस का परसेंट कैसे निकालते हैं?
परसेंट = (मौजूदा भाव − खरीद भाव) ÷ खरीद भाव × 100। मान लीजिए आपने ₹100 पर खरीदा और अभी भाव ₹120 है, तो हुआ (120−100) ÷ 100 × 100 = +20%। और अगर भाव ₹80 है तो (80−100) ÷ 100 × 100 = −20%। सबसे ज़रूरी बात यह है कि नीचे हमेशा आपका अपना खरीद भाव यानी लागत आएगी — हिसाब इसी का लग रहा है कि अपनी लागत के मुकाबले भाव कितने प्रतिशत ऊपर या नीचे है।
50% नुकसान के बाद ब्रेकईवन के लिए कितना चढ़ना पड़ता है?
पूरे 100% चढ़ना पड़ता है। 50% गिरने के बाद आपकी रकम आधी रह जाती है, और आधे से पूरे पर लौटने का मतलब है उसका दोगुना होना — यानी 100% की बढ़त। ब्रेकईवन का फ़ॉर्मूला है: नुकसान का हिस्सा ÷ (1 − नुकसान का हिस्सा)। इसलिए 50% नुकसान के सामने 100% की बढ़त चाहिए, वह 50% नहीं जो ज़्यादातर लोग मान बैठते हैं।
नुकसान और वापसी के परसेंट बराबर क्यों नहीं होते?
क्योंकि गिरते वक्त और चढ़ते वक्त आधार अलग-अलग होता है। गिरावट का हिसाब बड़ी रकम पर लगता है, जबकि वापसी का हिसाब घट चुकी छोटी रकम पर। आधार छोटा हो गया, इसलिए उसी पुराने बिंदु तक लौटने के लिए ज़्यादा बड़ा परसेंट चाहिए। नुकसान जितना गहरा, बची रकम उतनी कम, आधार उतना छोटा, और ब्रेकईवन के लिए ज़रूरी बढ़त उतनी ही बेतुकी दिखने लगती है। यही कंपाउंडिंग का उलटा चेहरा है।
90% नुकसान के बाद भी वापसी मुमकिन है क्या?
गणित कहता है कि ब्रेकईवन के लिए 900% चाहिए, यानी दस गुना। हक़ीक़त में यह बेहद मुश्किल है, ख़ासकर उन छोटे सिक्कों में जिनके पीछे कोई ठोस काम नहीं — गहरी गिरावट के बाद वे अक्सर वहीं पड़े रह जाते हैं। इसलिए गहरे फँसने के बाद चमत्कार की उम्मीद करने से बेहतर है कि नुकसान छोटा रहते ही जोखिम सँभाल लिया जाए और लीवरेज लगाकर अड़ा न जाए। गिरावट को काबू में रखना, बाद में वापसी की उम्मीद करने से कहीं ज़्यादा व्यावहारिक है। यह निवेश सलाह नहीं है, बस नंबर जो कह रहे हैं वह सामने रखा है।
भारत में मुनाफ़े पर TDS और टैक्स के बाद हाथ में कितना बचता है?
कागज़ पर दिख रहा मुनाफ़ा और हाथ में आने वाला मुनाफ़ा एक चीज़ नहीं हैं। भारत में क्रिप्टो एसेट के ट्रांसफ़र से हुए मुनाफ़े पर 30% की दर से टैक्स लगता है, उस पर लागू सरचार्ज और सेस अलग से, और नुकसान को मुनाफ़े के सामने घटाकर टैक्स कम कराने की छूट नहीं मिलती। इसके अलावा Section 393(1) (पहले 194S) के तहत ट्रांसफ़र पर 1% TDS भी कटता है, जिसकी सीमा तय मामलों में ₹50,000 और बाकी में ₹10,000 है। यानी स्क्रीन पर दिख रहा 20% का मुनाफ़ा जेब में 20% नहीं रहता। यह सब आयकर नियमों के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार है; यह टैक्स सलाह नहीं है — अपनी स्थिति के लिए CA से पूछें।

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